Sunday, 8 June 2014

गंगा हमारी


गंगा हमारी
छंद - कामरूप 
(विधान चार चरणप्रत्येक में 9710 मात्राओं पर यति ,चरणांत में गुरु व लघु)

भव ताप हारक, पाप नाशक, धरा उतरी गंग।
निर्मल प्रवाहित, प्रेम सरसित, करे मन जल चंग।।
सुंदर मनोरम, घाट उत्तम, देख कर मन दंग
शिव हरि उपासक, साधु साधक, जपे सुर मुनि संग।१।

 अति सलिल पावन, सार जीवन, बसे जिसमे प्रान। 
         बल बुद्धि दायक, रोग हारक, सुधा इसको मान ।।
सब सुख प्रदायक, मोक्ष दायक, गुणों की यह खान।
फिर हो न दूषित, नीर कलुषित, रखें इतना ध्यान।२।  

ममता समेटे, दोष मेटे, करे तन - मन शुद्ध
सुरसरित ध्यायें, ज्ञान पायें, बने मानस बुद्ध ।।
गंगा हमारी, माँ दुलारी, रहे मन अभिमान  
  गंगा बचाओ, मुक्ति पाओ, हो यही अभियान ।३।

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