Sunday, 29 June 2014

समाज और बेटियाँ


 
ओपन बुक्स ऑनलाइन लाइव महोत्सव,
अंक-४४ में मेरी रचना
विषय – समाज और बेटियाँ
 छंद – गीतिका
(विधान–  चार पदों का एक सम-मात्रिक छंद. प्रति पंक्ति 26 मात्राएँ होती हैं तथा प्रत्येक पद 14-12 अथवा  12-14 मात्राओं की यति के अनुसार होते हैं. पदांत में लघु-गुरु होना अनिवार्य है. इसके हर पद की तीसरी, दसवीं, सतरहवीं और चौबीसवीं मात्राएँ लघु हों तो छन्द की गेयता सर्वाधिक सरस होती है.)

    बेटियाँ गंगा नदी सी, पाप सारे धो रहीं।   
   झेलतीं संताप अनगिन, अस्मिता भी खो रहीं ।।   
वेद मन्त्रों की ऋचाएँ, बेटियाँ ही भक्ति हैं।
चेतना सामर्थ्य दात्री, बेटियाँ ही शक्ति हैं।१।

नारियों को पूजते थे, देवियों के रूप में।
देवता भी देखते थे, स्वर्ग के प्रारुप में।।
घूमते निर्द्वंद्व  हो के, आततायी देश में।
माँगती है न्याय बेटी, निर्भया के वेश में।२।

  कामियों के आज हाथों, लाज बेटी खो रही ।   
   भ्रूण हत्या कोख में  ही, बेटियों की हो रही ।।  
यातना का दर्द सारा, नर्क का परिवेश है।
लुप्त होती बेटियाँ औ, सुप्त सारा देश है।३।

                      - सत्यनारायण सिंह 

Sunday, 15 June 2014

नेता सारे खेलते




कुण्डलिया छंद



नेता सारे खेलते
सारे नेता खेलते, आज चुनावी खेल।
सत्ता के इस रूप में, द्रुपद सुता का मेल।।
द्रुपद सुता का मेल, पांडु सुत लगती जनता।
नेता शकुनी दाँव, चाल वादों की चलता।
लोक लुभावन खूब, लगाते ये हैं नारे।
चौसर बिछी बिसात, खेलते नेता सारे।१।

हांथी तीर कमान तो,कहीं हाँथ का चिन्ह।
कमल घडी औ साइकिल,फूल पत्तियाँ भिन्न।।
फूल पत्तियाँ भिन्न,दराती कहीं हथोडा।
झाड़ू रही बुहार,उगा सूरज फिर थोडा।।
देख चुनावी रंग, ढंग अपनाता साथी।
मर्कट सा व्यवहार,करे सर्कस का हांथी।२।

नोटा बटन दबाइये, सेवक हों ना योग्य।
वोट उसे ही दीजिये, चुन प्रत्याशी योग्य।।
चुन प्रत्याशी योग्य, कुशल कर्मठ विश्वाशी।
सेवाभावी अंग, प्रशासक गुण अनुशाशी।।
कहता सत्य पुकार,चले ना सिक्का खोटा
करिये सफल प्रयोग, विफल ना होगा नोटा।३।

            - सत्यनारायण सिंह 

खेल चौसर




ओपन बुक्स ऑनलाइन ,चित्र से काव्य तक छंदोत्सव,
अंक-३७ में मेरी रचना
 छंद - कामरूप 
   (विधान–     चार चरणप्रत्येक में 9710 मात्राओं पर यति ,चरणांत में गुरु व लघु)

शठ खेल चौसर गाँठ अवसर, चले नेता दाँव
ये गुल खिलायें जीत जायेंदिखें फिर ना गाँव।।
रवि चन्द्र तारे साक्ष सारे, सुरा सत्ता रंज
है छल कपट की कार्यशाला, खेल सुन शतरंज।१।

साइकिल हाँथी हाँथ साथी, कहीं झाड़ू गान
पत्ते रिझाते फूल भाते घडी रक्खे भान।।
मन कंज भाता सूर्य उगता, चढा तीर कमान
हर चिन्ह दलके भिन्न झलके, किन्तु चाल समान।२।

देश खातिर सुख चैन अपना, जो करे बलिदान
कुछ झांक उनमें आंक मनमें, फिर करें मतदान।।
मतदान करना फर्ज अपना, सबल हो सरकार
जन मन निखारें बन हजारे, रोध हो दमदार।३।

                                                                           -  सत्यनारायण सिंह 

Sunday, 8 June 2014

गंगा हमारी


गंगा हमारी
छंद - कामरूप 
(विधान चार चरणप्रत्येक में 9710 मात्राओं पर यति ,चरणांत में गुरु व लघु)

भव ताप हारक, पाप नाशक, धरा उतरी गंग।
निर्मल प्रवाहित, प्रेम सरसित, करे मन जल चंग।।
सुंदर मनोरम, घाट उत्तम, देख कर मन दंग
शिव हरि उपासक, साधु साधक, जपे सुर मुनि संग।१।

 अति सलिल पावन, सार जीवन, बसे जिसमे प्रान। 
         बल बुद्धि दायक, रोग हारक, सुधा इसको मान ।।
सब सुख प्रदायक, मोक्ष दायक, गुणों की यह खान।
फिर हो न दूषित, नीर कलुषित, रखें इतना ध्यान।२।  

ममता समेटे, दोष मेटे, करे तन - मन शुद्ध
सुरसरित ध्यायें, ज्ञान पायें, बने मानस बुद्ध ।।
गंगा हमारी, माँ दुलारी, रहे मन अभिमान  
  गंगा बचाओ, मुक्ति पाओ, हो यही अभियान ।३।