ओपन बुक्स
ऑनलाइन लाइव महोत्सव,
अंक-४४ में मेरी रचना
विषय – समाज
और बेटियाँ
छंद – गीतिका
(विधान– चार पदों का एक सम-मात्रिक छंद. प्रति पंक्ति 26
मात्राएँ होती हैं तथा प्रत्येक पद 14-12 अथवा 12-14 मात्राओं की यति के
अनुसार होते हैं. पदांत में लघु-गुरु होना अनिवार्य है. इसके हर पद की तीसरी, दसवीं, सतरहवीं और चौबीसवीं
मात्राएँ लघु हों तो छन्द की गेयता सर्वाधिक सरस होती
है.)
बेटियाँ गंगा नदी सी, पाप सारे धो रहीं।
झेलतीं संताप अनगिन, अस्मिता भी खो रहीं ।।
वेद मन्त्रों की ऋचाएँ, बेटियाँ ही भक्ति हैं।
चेतना सामर्थ्य दात्री, बेटियाँ ही शक्ति हैं।१।
नारियों को पूजते थे, देवियों के रूप में।
देवता भी देखते थे, स्वर्ग के प्रारुप में।।
घूमते निर्द्वंद्व हो के, आततायी देश में।
माँगती है न्याय बेटी, निर्भया के वेश में।२।
कामियों के आज हाथों, लाज बेटी खो रही ।
भ्रूण हत्या कोख में ही, बेटियों की हो रही ।।
यातना का दर्द सारा, नर्क का परिवेश है।
लुप्त होती बेटियाँ औ, सुप्त सारा देश है।३।


