अधीर दिवाली !
यह जग विराट
पूरे साल
जिसके आगमन की
आतुरता से
जोहता है बाट !
वह दिवाली
श्यामली धरा पर
शीतल मंद
समीर संग
खुशियाँ बाटने
अधीर सी उतरी.
जिसके स्वागत में
खेत खलिहान
घर आँगन
सोनजूही से महक उठे!
हर शहर हर नगर
हर डगर
हर हाट हर बाट
हर घाट
हर गल्ली हर नुक्कड
रंग बिरंगी आभा से
लहक उठे !
निशिगंधा के मादक सुगंध से
दिग्दिगंत को मोहित कर रही है
मदहोश निशा
और निखर उठा है!
आकाश मे झिलमिलाते
सितारों के साथ
कजली अमां का
स्यामल गात !
इस दीवाली पर मिले, सब मन को अभिराम।
यही कामना राम से,
जय जय सीताराम।।
-
सत्यनारायण सिंह
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